Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 19, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 19, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
यो यो नाम यथा ग्रीष्मे कल्पस्वेदाद्भवेत्कृमिः ।
यद्यद्दृश्यं शुद्धचित्खं तज्जीवो भवति स्वतः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई कहे आन्तर और बाह्य सभी जीवों का समान ही अधिष्ठान है, ऐसी स्थिति में आन्तरत्व
की कल्पना निर्मूल है, इसका क्या परिहार है ? इस पर कहते हैं।
जैसे ग्रीष्मकाल में शरीरान्तर्वर्ती मल और पसीने के कारण जो-जो कृमि उत्पन्न होते हैं, वे शरीर
के मल या पसीने के भीतर ही होते हैं । उसी दृष्टान्त से शुद्धचित्त भी आन्तर अथवा बाह्य जो-जो जहाँ
पर दृश्य होता है, उस-उस का भोक्ता जीव वहाँ पर हो जाता है