Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 19, Verses 18–19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 19, verses 18–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 18,19
संस्कृत श्लोक
ईक्षणादिषु रन्ध्रेषु प्रसरन्ती बहिर्मयम् ।
नानाकारविकाराढ्यं रूपमात्मनि पश्यति ॥ १८ ॥
स्थिरत्वात्तत्तथैवाथ जाग्रदित्यवगम्यते ।
जाग्रत्क्रम इति प्रोक्तः सुषुप्तादिक्रमं श्रृणु ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
नेत्र आदि छिद्रों
में संचार कर रही संवित् नाना प्रकार के आकार और विकारों से सम्पन्न बाह्यरूप को अपने में देखती
है वैसी ही वह स्थिर होने के कारण जाग्रत कही जाती है। भाव यह हे कि यद्यपि अनुभव के समय प्रतीति
स्वप्न के सदृश ही होती है, उससे भिन्न नहीं होती, फिर भी प्रतिदिन के प्रत्यभिज्ञान के बाद स्थिरत्व
कल्पना जाग्रत है, यह ज्ञान होता है । जाग्रत का क्रम इस प्रकार आपसे मैंने कहा, अब आप सुषुप्ति
आदि के क्रम को सुनिये