Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 19, Verse 15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 19, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
जीवधातुः शरीरेऽन्तर्विद्यते येन जीव्यते ।
तेजो वीर्यं जीवधातुरित्याद्यभिधमङ्ग यत् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रतिज्ञात विषय के वर्णन की भूमिका के रूप में स्वप्नद्रष्टा की जीव की सत्ता को सिद्ध करते हैं।
हे श्रीरामचन्द्रजी, इस शरीर के भीतर जीव वस्तु विद्यमान है, जिससे लोगों का जीवन रहता है।
“येन जीव्यते" इससे यह दर्शाया कि जीवित रहना ही जीव के अस्तित्व में प्रमाण है तेज यानी शरीर
की गमहिट, वीर्य यानी शरीर के व्यापार का कारण बल, जीवधातु यानी जीवन में हेतु निर्विशेष प्रेम
और आदि पद से 'अहम्' इत्यादि अभिमान का निमित्त ज्ञान आदि जिसके नाम हैं यानी तेज, बल, प्रेम
और ज्ञान ये सब जीव की सत्ता से ही हैँ । इसलिए जीव के सद्भाव में ये सब प्रमाण हैं