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Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 11

ढसवाँ सर्ग समाप्त ग्यारहवाँ सर्ग महर्षि भृगु के योगदृष्टि से भलीभाँति पुत्रवृत्तान्त प्रदर्शन से तथा काल के संवाद से जगत की स्थिति मन का खेल है, यह वर्णन |

55 verse-groups

  1. Verses 1–2काल ने कहा : हे मुनिजी, समंगा नदी के तट पर, जहाँ बड़ी-बड़ी तरंगो की पंक्तियों की गंभीर ध्…
  2. Verse 3हे मुनिजी, यदि आप पुत्रचरित्ररूप पुत्र के मनोभ्रम को, जो स्वप्न के तुल्य है, देखना चाहते…
  3. Verse 4यों कहने पर महर्षि भृगु ने योगदृष्टि से पुत्र के चरित्र का ध्यान किया
  4. Verse 5उन्होने ध्यानवश एक क्षण में बुद्धिरूपी दर्पण में प्रतिबिम्बित पुत्र के वृत्तान्त को आदि स…
  5. Verse 6फिर समंगा नदी के तट से आकर मन्दराचल के शिखर पर कालके आगे स्थित अपने स्वस्थ शरीर में भृगु…
  6. Verse 7आश्चर्य से विकसित सुन्दर दृष्टि से राग-द्वेषशून्य काल को देखकर पुत्र के प्रति रागरहित हुए…
  7. Verse 8हे भगवन्‌, हे भूत और भविष्य के अधिपति, हम लोगों का चित्त स्नेह आदि से मलिन है, इसलिए हम ल…
  8. Verse 9तरह-तरह के विकारों से भरी हुई ओर असत्य स्वरूपवाली यह जगत्‌ स्थिति सत्य-सी प्रतीत होती हुई…
  9. Verse 10विषयभूत जगत-स्थिति की तरह कारणभूत मन का रूप भी हम लोगों के लिए दुर्ज्ञेय है, ऐसा कहते हैं…
  10. Verse 11भगवन्‌, मेरे इस पुत्र की महाकल्प तक मृत्यु नहीं है ऐसा मुझे ज्ञात था । इसीलिए उसे मृत देख…
  11. Verse 12हे देव, मेरे पुत्र की आयु अभी क्षीण नहीं हुई है फिर भी काल उसे ले गया, इस प्रकार मेरी तुच…
  12. Verse 13हे विभो, यद्यपि हम लोग संसार की गति को भलीभाँति जान चुके हैं तथापि भगवदिच्छावश हम आपत्तिय…
  13. Verse 14भगवन्‌, अपकार या अनुचित कार्य करनेवाले व्याक्ति पर क्रोध करना चाहिए और उचित कर्मकारी पर प…
  14. Verse 15जब तक यह अवश्य करना चाहिए, यह नहीं करना चाहिए यों इष्ट ओर अनिष्ट साधनों का फल सत्य है, ऐस…
  15. Verse 16पूर्व वर्णित रीति से अपराध के रहते भी क्रोध करना उचित नहीं है, यदि अपराध बिलकुल न हो, उसे…
  16. Verse 17हे देवाधिदेव, आपने इस समय मुझे मेरे पुत्र के चरित्र का स्मरण कराया है, इस कारण समंगा नदी…
  17. Verse 18इस जगत में मन ही भौतिक शरीर की कल्पना करता है, इसलिए सर्वत्र जानेवाले मन ही प्राणियों के…
  18. Verse 19इस तरह विनयपूर्ण वार्तालाप से एवं अपने द्वारा उपदिष्ट सूक्ष्मतत्त्व के ग्रहण से काल सन्तु…
  19. Verse 20जैसे बालक अज्ञानवश अविद्यमान वेताल की कल्पना करता है वैसे ही मन संकल्प से पूर्व में नहीं…
  20. Verse 21मन की असत्‌ पदार्थ के निर्माण की शक्ति सब लोगों के अनुभव से सिद्ध है, ऐसा कहते हैं। देखिय…
  21. Verse 22हे महामुनिजी, इस स्थूल दृष्टि की अवस्था का अवलम्बन कर पुरुष के मनरूप सूक्ष्मशरीर और स्थूल…
  22. Verse 23तब यूक्ष्म दृष्टि कौन है ? इस शंका पर कहते हैं। हे मुनिजी, एकमात्र मनन से बने हुए ही ये त…
  23. Verse 24जैसे अज्ञानवश आकाश में द्विचन्द्रता का उदय होता है वैसे ही चित्तरूपी देह की अवयवभूत लता क…
  24. Verse 25भेदवासना से पदार्थ समूह को देख रहा मन सब जगह घट, गर्त, वस्त्र आदि को भिन्न-भिन्न देखता है
  25. Verse 26मैं दुबला-पतला हूँ, मैं बड़ा दुःखी हूँ, मैं मूर्ख हूँ इन भावनाओं की तथा इनसे अतिरिक्त अन्…
  26. Verse 27मन का संसार में आने का क्रम दर्शा कर अब मन की संसार से निवृत्ति का उपाय कहते हैं। मनन मेर…
  27. Verses 28–33जैसे फैली हुई अनेक लहरों से भरपूर, अनेक बड़े-बड़े कल्लोल से शोभित होने वाले तथा दूरगमनरूप…
  28. Verses 34–38उसकी और भी अनेक हर्ष और भय की अवस्थाओं को दिखलाते हैं। चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब में उपाधिरू…
  29. Verse 39दृष्टान्त में पूरवोक्ति रीति से आरोप कह कर अपवाद दिखलाते हैं। जलसमूहरूप सागर से वे तरंगें…
  30. Verses 40–44ये तरंगें नष्ट होकर फिर उत्पन्न होती हैं, उत्पन्न हो- होकर फिर-फिर समुद्र में नष्ट होती ह…
  31. Verse 45जैसे जल में अनेक लहर वृद्धि को प्राप्त होती हैं वैसे ही ब्रह्म मे ब्रह्म ही जगत रूप से वृ…
  32. Verse 46यह सब ब्रह्म ही हे, जगत एकमात्र ब्रह्म ही है, ऐसी भावना प्रयत्नपूर्वक कीजिये ओर सबका परित…
  33. Verse 47अन्य के परित्याग मेँ उपायरूप से सबके अधिष्ठान सन्मात्र का बोध कराते हैं। नानारूपवाली होने…
  34. Verse 48यदि कोई शंका करे कि जड़ और अजड पदार्थो मे अधिष्ठानरूप से विद्यमान सत्ता सदा सर्वत्र एकाका…
  35. Verse 49इस प्रकार पूर्ववर्णित दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिक की समता अक्षुण्ण रही, ऐसा कहते हैं । हे…
  36. Verse 50जैसे समुद्र के जल में समुद्र का जल विविध प्रकार की गतिविधियों से अपने आप भेद को प्राप्त क…
  37. Verse 51जैसे विविध आकार-प्रकार की लहरें जल से भिन्न नहीं है, वैसे ये समस्त कल्पनाएँ परमात्मा से भ…
  38. Verse 52जैसे एक बीज में शाखा, फूल, लता, पत्ते, फल, कली की स्थिति है, वैसे ही परमात्मा में सदा सर्…
  39. Verse 53परिणामवाद के दृष्टान्तों से ब्रह्म से जगत की अभिन्नता का उपपादन कर अव विवर्तवावरे प्रसिद्…
  40. Verse 54जैसे एक रंग के मेघ से रंग-बिरंग के इन्द्रधनुष की उत्पत्ति होती है वैसे ही विचित्रतारहित,…
  41. Verse 55चेतन से अचेतन की उत्पत्ति में भी परिणामवाद और विवर्तवाद इन दोनों वादों के अनुरूप दो दृष्ट…
  42. Verse 56यदि कोई शंका करे कि जब चित्‌ का एक रूप है, तब उसके कार्यभूत अचित्‌ में भेद कैसे सिद्ध हुआ…
  43. Verse 57हे ब्रह्मन्‌, जैसे रेशम का कीड़ा तन्तुजाल की रचनाकर अपने कठिन बन्धन की स्वयं रचना करता है…
  44. Verse 58जैसे हाथी अपने बन्धनस्तम्भ से छुटकारा पाता है वैसे ही आत्मा अपनी इच्छा से अपने पूर्ण स्वर…
  45. Verse 59आत्मा सदा जैसी भावना करता है, स्वयं वैसा हो जाता है और महान होता हुआ भी मन की शक्ति से वै…
  46. Verse 60जैसे वर्षा ऋतु का विपुल कुहरा सम्पूर्ण आकाश को अपने रूप में रंग देता है वैसे ही भावित शक्…
  47. Verse 61जैसे छः ऋतुओं में जो ऋतु जिस समय रहती है, उस समय वृक्ष तन्मय हो जाता है, वैसे ही जो शक्ति…
  48. Verses 62–63यह बन्ध और मोक्ष की कल्पना अज्ञ की दृष्टि से है, तत्त्वद्ृष्टि से तो उनकी संभावना ही नहीं…
  49. Verse 64वास्तव में न तो मोक्ष है और न बन्धन है, फिर भी यह आत्मा बन्धन-मोक्षरूप विकारों से युक्त-स…
  50. Verse 65परस्पर मिलते-जुलते रूपवाली, सर्वथा विकल्पित आकारवाली ये करोड़ों मन की शक्तियाँ इस परमात्म…
  51. Verse 66जैसे समुद्र से उत्पन्न हुई और समुद्र में ही विद्यमान तरंगें समुद्र से पृथक्‌ सी प्रतीत हो…
  52. Verses 67–68कर्मन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रियों के भेद अथवा तामस और सात्विक भेद से सृष्टि-विभाग को कहने के…
  53. Verse 69[अपने स्वभाव से जिन्होंने अपने स्वरूप की कल्पना की है, ऐसी कोई ये लहरें यम, महेन्द्र, सूर…
  54. Verses 70–74पर्वत के कुजों में तथा समुद्र की तीर भूमि के वन में वृक्ष, लता आदि के तुल्य चंचल कोई मनुष…
  55. Verse 75इन जीवसंविदों में किन्हींकी आयु बहुत लम्बी है, कोई बहुत थोड़े दिनों तक जीवित रहती हैं, कि…