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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 11, Verses 40–44

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 11, verses 40–44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 40-43

संस्कृत श्लोक

नष्टानष्टाः पुनर्जाता जाताजाताः पुनः पुनः । परस्परपरामर्शान्नान्यतामुपयान्त्यलम् ॥ ४० ॥ एकरूपाम्बुसामान्यमया एव निरामयाः । तथैवास्मिन्प्रवितते सिते शुद्धे निरामये ॥ ४१ ॥ ब्रह्ममात्रैकवपुषि ब्रह्मणि स्फाररूपिणि । सर्वशक्तावनाद्यन्ते पृथग्वदपृथक्कृताः ॥ ४२ ॥ संस्थिताः शक्तयश्चित्रा विचित्राचारचञ्चलाः । नानाशक्तिर्हि नानात्वमेति स्वे वपुषि स्थितिम् ॥ ४३ ॥ बृंहितं ब्रह्मणि ब्रह्म पयसीवोर्मिमण्डलम् । स्त्रीपुमान्व्यङ्गरूपेण ब्रह्मेव परिवर्तते ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

ये तरंगें नष्ट होकर फिर उत्पन्न होती हैं, उत्पन्न हो- होकर फिर-फिर समुद्र में नष्ट होती हैं, परस्पर के सम्मेलन से अत्यन्त भेद को प्राप्त नहीं होती हैं। वे एकमात्र जलमय और निर्विकार ही हैं। वैसे ही इस सर्वव्यापक, ज्योतिस्वरूप, शुद्ध, निर्विकार, एकमात्र निरंकुश बृहणस्वभाववाले अतएव ब्रह्म" शब्द से पुकारे जानेवाले परिपूर्णरूप सर्वशक्तिसम्पन्न, जन्म- नाशशून्य परम तत्त्व में आश्चरयपूर्णं विचित्र जन्म-मरण आदि व्यापारो से चंचल जगत, जो उससे पृथक्‌ नहीं हे, पृथक्‌ के तुल्य स्थित हैँ । विविध विचित्र शक्तिवाला ब्रह्म ही अपने शरीर में भिन्नता को प्राप्त होता है