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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 11, Verses 28–33

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 11, verses 28–33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 28-33

संस्कृत श्लोक

यथा प्रवितताम्भोधौ द्रुतां नैकतरङ्गिणि । शाम्यत्स्पन्दतयानेककल्लोलावलिशालिनि ॥ २८ ॥ वार्यात्मनि समे स्वच्छे शुद्धे स्वादुनि शीतले । अविनाशिनि विस्तीर्णे महामहिमनि स्फुटे ॥ २९ ॥ ह्रस्वस्तरङ्गः स्वं रूपं भावयन्त्यस्वभावतः । ह्रस्वोऽस्मीति विकल्पेन करोति स्वेन भावनाम् ॥ ३० ॥ दीर्घस्तरङ्गः स्वं रूपं भावयन्त्यस्वभावतः । दीर्घोऽस्मीति विकल्पेन करोति स्वेन भावनाम् ॥ ३१ ॥ ह्रस्वश्चैव परिभ्रष्टरूपोऽस्मीति तलातलम् । भावयन्भूतलं याति तादृग्भावनया स्वया ॥ ३२ ॥ उत्पन्नश्च पलादूर्ध्वमुत्थितोऽस्मीति भावितः । सरश्मिरत्नजालस्तु शोभते दीप्तया श्रिया ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे फैली हुई अनेक लहरों से भरपूर, अनेक बड़े-बड़े कल्लोल से शोभित होने वाले तथा दूरगमनरूप स्पन्दन होने के कारण स्पन्दनरहित विशाल समुद्र में, जो जलमय, सम, स्वच्छ, शुद्ध, स्वादु, शीतल, अविनाशी विस्तारयुक्त महामहिमाशाली और प्रत्यक्ष है, छोटी तरंग अपने स्वभाव के अनुसार अपने स्वरूप की भावना करती हुई अपने विकल्प से मैं छोटी हूँ, ऐसी भावना करती ह । बड़ी तरंग अपने स्वभाव से अपने स्वरूप की भावना करती हुई अपने विकल्प से मैं बड़ी हूँ, ऐसी भावना करती है , छोटी तरंग पाताल की भावना करती हुई मेरा स्वरूप परिभ्रष्ट हो रहा हे, यों पतन के भय से अपनी उक्त भावना वश तटभूमि को प्राप्त होती है । उत्पन्न होकर थोड़े समय के बाद मैं भोगयोग्य जन्म को प्राप्त हुई हूँ, ऐसा अभिमान करती हुई भाग्यवश पर्वत की नाई उज्जवल मणियों की किरणों से विभूषित होकर दीप्त कान्ति से शोभा पाती है। मैं भूषित हूँ, यों समझकर प्रसन्न होती है, यह अर्थ हे