Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 11, Verses 67–68
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 11, verses 67–68 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 67,68
संस्कृत श्लोक
अस्मिन्स्पन्दमये स्फारे परमात्ममहाम्बुधौ ।
चिज्जले वितताभोगे चिन्मात्ररसमालिनि ॥ ६७ ॥
काश्चित्स्थिरा ब्रह्मविष्णू काश्चिद्रुद्रत्वमागताः ।
काश्चित्पुरुषतां प्राप्ताः काश्चिद्देवत्वमागताः ।
लहर्यः प्रस्फुरन्त्येताः स्वभावोद्भावितात्मकाः ।
काश्चिद्यममहेन्द्रार्कवह्निवैश्रवणादिकाः ।
घ्नन्ति कुर्वन्ति तिष्ठन्ति लहर्यश्चपलैषणाः ।
काश्चित्किंनरगन्धर्वविद्याधरसुरादिकाः ।
उत्पतन्ति पतन्त्युग्रा लहर्यः परिवल्गिताः ।
काश्चित्किंचित्स्थिराकारा यथा कमलजादिकाः ।
काश्चिदुत्पन्नविध्वस्ता यथा सुरनरादिकाः ॥ ६८ ॥
हिन्दी अर्थ
कर्मन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रियों के भेद अथवा तामस और सात्विक भेद से सृष्टि-विभाग को कहने के
लिए यहाँ पर क्रमशः दो दृष्टान्त दिये गये हैं, यह समझना चाहिये।
मुख्य और अमुख्य बन्धनरूप उपाधिवाले जीवरूप संविद् भेदों को ही नाम-रूप-क्रिया के वैचित्र्य
से विस्तारपूर्वक दशनि के लिए भूमिका रचते हैं।
इस स्पन्दमय, विशाल, परमात्मरूप महासागरमें, जिसमें चैतन्य ही जल है और जिसका
विशाल आकार है एवं एकमात्र चिद्रस से जो सुशोभित होता है, कोई स्थिर जीवनामक संवित्भेद
ब्रह्मा, विष्णु हुए हैं, कोई रुद्रत्व को प्राप्त हुए हैं, कोई कोई पुरुषत्व को प्राप्त हुए हैं और कोई देवत्व
को प्राप्त हुए हैं