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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 11, Verses 1–2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 11, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 1,2

संस्कृत श्लोक

काल उवाच । अद्योद्दामतरङ्गौघभाङ्काररणितानिले । तीर एव तरङ्गिण्यास्तपस्तपति ते सुतः ॥ १ ॥ जटावानक्षवलयी जितसर्वेन्द्रियभ्रमः । तत्र वर्षशतान्यष्टौ संस्थितस्तपसि स्थिरे ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

काल ने कहा : हे मुनिजी, समंगा नदी के तट पर, जहाँ बड़ी-बड़ी तरंगो की पंक्तियों की गंभीर ध्वनियों से वायु प्रतिध्वनित होते हैं, आपका पुत्र तपस्या कर रहा है उसने जटा धारण कर रक्खी है, रुद्राक्ष की मालाओं के कंकण पहन रक्खे हैं और सब इन्द्रियों के अपने-अपने विषयों में भ्रमण को रोक दिया है । इस प्रकार की गतिविधि से युक्त वह आठ सौ वर्षों से वहाँ पर अटल तपस्या में स्थित है

सर्ग सन्दर्भ

ढसवाँ सर्ग समाप्त ग्यारहवाँ सर्ग महर्षि भृगु के योगदृष्टि से भलीभाँति पुत्रवृत्तान्त प्रदर्शन से तथा काल के संवाद से जगत की स्थिति मन का खेल है, यह वर्णन |