Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 11, Verse 10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 11, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

त्वमेव देव जानासि त्वदभ्यन्तरवर्ति यत् । रूपमस्या मनोवृत्तेरिन्द्रजालविधायकम् ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

विषयभूत जगत-स्थिति की तरह कारणभूत मन का रूप भी हम लोगों के लिए दुर्ज्ञेय है, ऐसा कहते हैं। हे देव, इस मनोवृत्ति का जो स्वरूप आपके अन्दर रहता है ओर इन्द्रजाल के तुल्य माया और मोह की सृष्टि करता है, उसे आप ही जानते हैं