Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 11, Verses 34–38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 11, verses 34–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 34-37
संस्कृत श्लोक
तुषारकरबिम्बस्थः शीतलोऽस्मीति बिम्बति ।
सतटाचलदावाग्निप्रतिबिम्बो ज्वलद्वपुः ॥ ३४ ॥
बिभेति बत दग्धोऽस्मीत्यात्तमौनश्च कम्पते ।
प्रतिबिम्बितवेलाद्रितटपक्षवनद्रुमः ॥ ३५ ॥
महदारम्भसंरम्भसंयुक्तोऽस्मीति राजते ।
विशल्लोलानिलात्यन्तध्वस्तलोलशरीरकः ॥ ३६ ॥
खण्डशः परियातोऽस्मीत्यात्तक्रन्द इवारवी ।
न चोर्मयस्ते जलधेर्व्यतिरिक्ताः पयोधरात् ॥ ३७ ॥
नचैकं रूपमेतेषां किंचित्सन्नाप्यसन्मयम् ।
नचैते ह्रस्वदैर्घ्याद्या गुणास्तेषु न तेषु ते ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
उसकी और भी अनेक हर्ष और भय की अवस्थाओं को दिखलाते हैं।
चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब में उपाधिरूप से स्थित होकर उक्त तरंग अपने को शीतल समझती है,
तटवर्ती पर्वत की वनाग्नि के प्रतिबिम्ब से युक्त वह जलते हुए स्वरूपवाली होकर मैं जल गई हूँ, यों
समझकर भयभीत होती है और मौन धारण कर काँपती हे समुद्र के तटवर्ती पर्वत के तटों के परों के
तुल्य वनवृक्ष जिसमें प्रतिबिम्बित हैं, ऐसी वह तरंग राज्यप्राप्तिरूप फलवाले कार्याडम्बर से मैं कृतार्थ
हूँ, यों सुशोभित होती है । अपने स्वरूप में घुस रहे चंचल वायु से खूब तहस-नहस अतएव चंचल
शरीरवाली वही तरंग मैं टुकड़े-टुकड़े हो गई हूँ, यों रोती हुई सी ध्वनियुक्त होती हे