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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 11, Verse 48

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 11, verse 48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 48

संस्कृत श्लोक

जडाजडमुपादत्ते चित्तमायाति चिन्मये । वासनारूपिणी शक्तिः स्वस्थरूपा स्थितात्मनः ॥ ४८ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई शंका करे कि जड़ और अजड पदार्थो मे अधिष्ठानरूप से विद्यमान सत्ता सदा सर्वत्र एकाकार कैसे हो सकती है ? तो इस पर चित्त द्वारा कल्पित जड़ और अजड के विकल्पों से सन्मात्र की एकरूपता की क्षति नहीं हो सकती, इस आशय से कहते है । चिदाभास के चित्त को प्राप्त होने पर उससे व्याप्त अहंकार को ही आत्मरूप से तथा उससे अतिरिक्त को अनात्मरूप से मान रहा मन अनाध्यात्मिक जड़ है और आध्यात्मिक अजड़ है, ऐसा भेद करता है। यह चित्त की भेदवासनारूपिणी शक्ति यदि अधिष्ठानसन्मात्र से अतिरिक्त मानी जाय, तो मिथ्या हो जायेगी, इसलिए वह आत्मा का स्वरूप ही है, इसलिए सत्ता की एकरसता की हानि नहीं हैं