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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 11, Verses 62–63

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 11, verses 62–63 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 62

संस्कृत श्लोक

न मोक्षो मोक्ष ईशस्य न बन्धो बन्ध आत्मनः । बन्धमोक्षदृशौ लोके न जाने प्रोत्थिते कुतः ॥ ६२ ॥ नास्ति बन्धो न मोक्षोऽस्ति तन्मयस्त्विव लक्ष्यते । ग्रस्तं नित्यमनित्येन मायामयमहो जगत् ॥ ६३ ॥

हिन्दी अर्थ

यह बन्ध और मोक्ष की कल्पना अज्ञ की दृष्टि से है, तत्त्वद्ृष्टि से तो उनकी संभावना ही नहीं है, ऐसा कहते हैं। जो लोक में मोक्ष कहा जाता है, वह परमात्मा का मोक्ष नहीं है और बन्धन भी आत्मा का बन्धन नहीं है। न मालूम ये बन्धन-मोक्ष दृष्टियाँ लोक में कहाँ से टपकी ? अर्थात्‌ बन्धन-मोक्ष की कथा ही नहीं है