Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 11, Verse 66
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 11, verse 66 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 66
संस्कृत श्लोक
तज्जास्तत्स्थाः पृथग्रूपाः समुद्रादिव वीचयः ।
तज्जास्तत्स्थाः पृथक्स्थाश्च चन्द्रादिव मरीचयः ॥ ६६ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे समुद्र से उत्पन्न हुई और
समुद्र में ही विद्यमान तरंगें समुद्र से पृथक् सी प्रतीत होती हैं और जैसे चन्द्रमा से आविर्भूत और चन्द्रमा
में स्थित किरणें चन्द्रमा से पृथक् सी स्थित रहती हैं, वैसे ही ये मन की शक्तिरूप सृष्टियाँ परमात्मा से
उत्पन्न हैं और उसी में स्थित हैं फिर भी पृथक् सी प्रतीत होती हैं