Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 11, Verse 69
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 11, verse 69 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 11 · श्लोक 69
संस्कृत श्लोक
कृमिकीटपतङ्गाहिगोमशाजगरादिकाः ।
काश्चित्तस्मिन्महाम्भोधौ स्फुरन्त्येतेम्बुबिन्दुवत् ॥ ६९ ॥
हिन्दी अर्थ
[अपने स्वभाव से जिन्होंने अपने स्वरूप की कल्पना की है, ऐसी कोई ये लहरें यम, महेन्द्र, सूर्य,
अग्नि, कुबेर आदि रूप से स्फुरित होती हैं । चंचल वृत्तिवाली ये लहरियाँ आपस में एक दूसरे का विनाश
करती हैं, स्वोचित व्यवहार करती हैं और अपना स्वरूप बनाये रखती हैं । किन्नर, गन्धर्व, विद्याधर,
देव आदि कोई लहरियाँ ऊपर को उठती हैं और कोई नीचे गिरती हैं। कोई कुछ स्थिर आकारवाली है
जैसे कि ब्रह्मा आदि और कुछ उत्पन्न होते ही नष्ट हो जाती है, जैसे देवता, मनुष्य आदि ॥१-३१/२॥]
महासागर में जल के बुद्बुदों की तरह कृमि, कीट, पतंग, सर्प, गाय, मच्छर, अजगर आदि कोई
जीवसंवित् इस चैतन्यरूपी महासागर में अत्यल्प समयके लिए स्फुरित होती है