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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 89

अद्जसीवाँ सर्ग समाप्त नवासीवाँ सर्ग बद्धमूल मन की अन्य प्रयत्नं से अविचलता का इन्दु ओर अहल्या की मनोवृत्ति से कथन द्वारा वर्णन |

31 verse-groups

  1. Verse 1भानु ने कहा : भगवन्‌, मन ही जगतो का रचयिता है, समष्टिभावापन्न मन ही परम पुरुष यानी हिरण्य…
  2. Verse 2मन की सामर्थ्य देखिए, एेन्दव साधारण ब्राह्मण होकर भी मनकी भावना से ब्रह्मा के पद को प्राप…
  3. Verse 3मन से “में तुच्छ देह हूँ” ऐसी भावना करने पर नर देहता को (जन्म, मरण आदि धर्मवत्ताको) प्राप…
  4. Verse 4बाह्यदुष्टि यानी देह आदि में आत्मबुद्धि करनेवाले पुरुष को देह में सुख, दुःख आदि की प्राप्…
  5. Verse 5इसलिए यह निश्चित हुआ कि सम्पूर्ण भ्रमो से पूर्ण जगत्‌ मन से ही उत्पन्न हुआ है, इस विषय मे…
  6. Verse 6ब्रह्माजी ने कहा : भगवन्‌ भानुजी, यहाँ पर कौन अहल्या है ओर हे तमोनाशिन्‌ ! कौन इन्द्र है…
  7. Verses 7–8सूर्य ने कहा : हे देव, सुना जाता है, प्राचीन समय में मगध देश में इन्द्रद्युम्न नामका राजा…
  8. Verse 9उसी नगर में सम्पूर्ण विटों में श्रेष्ठ ओर विटविद्यामें कुशल इन्द्रनामक कोई विट ब्राह्मणकु…
  9. Verse 10पटरानी अहल्या ने कहीं पर कथा के प्रसंग से पहले अहल्या (गौतमपत्नी) इन्द्रकी इष्ट हुई थी, ऐ…
  10. Verse 11ऐसा सुनकर अहल्यानामक राजा की पत्नी इन्द्रनामक विटपर अनुरागिणी हुई । तदनन्तर मुझपर आसक्त व…
  11. Verse 12वह बाला कमलनालों के समूह तथा केले के पल्लवो के बिछौने पर वनमें जैसे कटी हुई लता सन्तप्त ह…
  12. Verse 13जसे ग्रीष्म ऋतुमें सन्तप्त वनभूमि में मछली तड़पती है वैसे ही सकल राजसम्पत्तियों में उसे ख…
  13. Verse 14यह इन्द्र है, यह इन्द्र है, इस प्रकार वह प्रलाप करती थी । कामदेव की पराधीनता को प्राप्त ह…
  14. Verses 15–17उसकी वैसी दुरवस्था देखकर दुःखित हुई उसकी एक सखी ने उससे बड़े प्रेम के साथ कहा : प्रिये, इ…
  15. Verses 18–19वह सखी इन्द्र को युक्तिपूर्वक समझा-बुझाकर रात्रिमें अहल्याके निकट शीघ्र ले आई। तदनन्तर कि…
  16. Verses 20–21जैसे वसन्त लता को रस से अपने अधीन करता हे, वैसे ही हार, केयूर आदि से मनोहर उस विट से, वह…
  17. Verse 22कुछ समय के बाद राजा को उस अहल्या के मुखरूपी आकाश को प्रकाशित करनेवाली इन्द्रानुरागिता ज्ञ…
  18. Verse 23जितने समय तक वह इन्द्रका ध्यान करती थी, उतने समय तक उसका मुख ऐसा शोभित होता था, जैसे कि प…
  19. Verse 24इन्द्रकी भी समस्त इन्द्र्यो उसपर आसक्त थी, अतः वह बड़ा व्याकुल रहता था, उसके बिना कहीं पर…
  20. Verse 25तदुपरान्त अत्यन्त प्रगाढ स्नेह होने के कारण प्रकाशरूप से कामचेष्टावाले उन लोगों का दुर्वि…
  21. Verse 26राजा ने उनका परस्पर अत्यन्त आसक्तिवाला भाव देखकर बहुत से दण्डो से उन दोनों का शासन किया
  22. Verse 27उन दोनों को हेमन्त ऋतुमें तालाब में छोड़ा, फिर भी वे बड़े सन्तुष्ट होकर हँसते थे, वहाँ उन…
  23. Verses 28–29तदनन्तर राजा ने उनसे पूछा : हे दुर्मतियों, तुम खिन्न हो या नहीं”, जलाशय से निकाले गये उन…
  24. Verse 30चूँकि हम लोगों का संग यानी मन का सम्बन्ध निःशंक है यानी पृथक्‌ होने की शंका से रहित है, इ…
  25. Verses 31–36तदनन्तर वे भाड़ में (भङर्भूजे की भवी में) झोंके गये, वहाँ पर भी प्रसन्न ही रहे । उन्होने…
  26. Verses 37–49यह देह मन का विस्तारमात्र ही देखा जाता है । यदि कहिए मै मन को ही दण्ड से नष्ट कर डालूँगा,…
  27. Verse 50यदि कोई कहे की देह ही मन का कारण है, देह उत्पीडन होने पर मनका उत्पीड़न क्यों नहीं होता ?…
  28. Verse 51हे महात्मन्‌, मन आत्मा का पहला भोगायतन है, यह समझिए ओर उसने जगत्‌ में सम्पूर्ण शरीरों की…
  29. Verse 52उक्त अर्थ का ही दृष्टान्त द्वारा उपपादन करते हुए कहते हैं । हे सुभग, मन को ही मुख्य अंकुर…
  30. Verse 53इसीलिए देह का नाश होने पर भी पुनः पुनः देह की उत्पत्ति होती है, किन्तु चित्त का नाश होने…
  31. Verse 54जो बात पहले कही थी, उसीका समुचितरूप से अनुवाद कर उपसंहार करते हुए दण्ड में प्रयत्न की विफ…