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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 89, Verses 15–17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 89, verses 15–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 89 · श्लोक 15-17

संस्कृत श्लोक

इत्यार्तया घनस्नेहमथ तस्या वयस्यया । उक्तं तया प्रियेऽविघ्नमिन्द्रमभ्यानयाम्यहम् ॥ १५ ॥ इष्टं तवानयामीति श्रुत्वा विकसितेक्षणा । पपात पादयोः सख्या नलिन्या नलिनी यथा ॥ १६ ॥ ततः प्रयाते दिवसे समायाते निशागमे । सा वयस्या तमिन्द्राख्यं ययौ द्विजकुमारकम् ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

उसकी वैसी दुरवस्था देखकर दुःखित हुई उसकी एक सखी ने उससे बड़े प्रेम के साथ कहा : प्रिये, इन्द्र को मैं बिना किसी प्रकार की विघ्नबाधा के तुम्हारे समीप लाती हूँ। तुम्हारे इष्ट को तुम्हारे समीप लाती हूँ । यह सुनकर उसकी आँखें विकसित हो गई, जैसे मुरझाई हुई नलिनी (कमल) के पैर पर गिरती है, वैसे ही वह सखी के पैरपर गिर पडी । तदनन्तर दिन के बीतने पर जब सन्ध्या हुई तब उसकी वह सखी इन्द्रनामक उस ब्राह्मणबालक के पास गई