Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 89, Verse 23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 89, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 89 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
इन्द्रं ध्यायति सा यावत्तावत्तस्या विराजते ।
मुखं पूर्णेन चन्द्रेण प्रबुद्धमिव कैरवम् ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
जितने समय तक वह इन्द्रका ध्यान
करती थी, उतने समय तक उसका मुख ऐसा शोभित होता था, जैसे कि पूर्ण चन्द्रमा से
विकसित कुमुद सुशोभित होता है