Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 89, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 89, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 89 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
बाह्यदृष्टिर्हि नियतं सुखदुःखादि विन्दति ।
नान्तर्मुखतया योगी देहे वेत्ति प्रियाप्रिये ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
बाह्यदुष्टि यानी देह आदि में आत्मबुद्धि
करनेवाले पुरुष को देह में सुख, दुःख आदि की प्राप्ति होती है, अन्तर्मुख होने के कारण
(चेतन आत्मा को आत्मा समझने के कारण) योगी को देहमें प्रिय ओर अप्रिय का ज्ञान नहीं
होता