Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 89, Verses 31–36
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 89, verses 31–36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 89 · श्लोक 31-36
संस्कृत श्लोक
ततो भ्राष्ट्रे परिक्षिप्तावखिन्नावेवमेव तौ ।
ऊचतुर्मुदितात्मानावन्योन्यस्मृतिहर्षितौ ॥ ३१ ॥
ग्रथितौ गजपादेषु न खिन्नावेव संस्थितौ ।
एवमेवोचतुर्भूपमन्योन्यस्मृतिहर्षितौ ॥ ३२ ॥
कशाहतावखिन्नौ तावेवमेव किलोचतुः ।
अन्यस्माच्छासनाद्राज्ञा कल्पिताच्च पुनः पुनः ॥ ३३ ॥
उद्धृतावूचतुः पृष्टौ तमेवार्थं पुनः पुनः ।
उवाचेन्द्रो महीपालं जगन्मे दयितामयम् ॥ ३४ ॥
न शातनानि दुःखानि बाधन्ते किंचिदेव मे ।
अस्याश्चैव जगद्राजन्सर्वं मन्मयमेव च ॥ ३५ ॥
तेनान्यशासनाद्दुःखं किंचिदेव न विद्यते ।
मनोमात्रमहं राजन् मनो हि पुरुषः स्मृतः ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
तदनन्तर
वे भाड़ में (भङर्भूजे की भवी में) झोंके गये, वहाँ पर भी प्रसन्न ही रहे । उन्होने पहले की तरह
राजा से कहा : परस्पर की स्मृति से हर्षित होकर वहाँ पर भी हम सुखी रहे । तदुपरान्त हाथी
के पैरों में बाँध दिये गये | वहाँ पर भी पूर्ववत् वे प्रसन्न रहे । परस्पर स्मृति से हर्षित होकर
उन्होने राजा से फिर वैसे ही कहा । कोड़ों से पीटे गये फिर भी वे छिन्न न हुए, पहले की तरह
फिर भी उन्होने राजा से कहा । राजा से दिये गये अन्यान्य दण्डो से पुनः पुनः निकाले गये
उन्होने पूछने पर फिर-फिर वैसे ही उत्तर दिया । इन्द्र ने राजा से कहा : राजन्, सम्पूर्ण जगत्
मेरे लिए दयितामय है, दुःखहेतु शरीरच्छेदन आदि मुझे कुछ भी दुःख नहीं देते । हे राजन्,
इसका भी सम्पूर्ण जगत् मन्मय हो गया है, इसलिए अन्य पीडन से भी हम लोगों को कुछ दुःख
नहीं होता हे । हे राजन्, मैं मनोमात्र हूँ और मन ही पुरुष कहा गया हे