Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 89, Verses 20–21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 89, verses 20–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 89 · श्लोक 20,21
संस्कृत श्लोक
हाराङ्गदमनोज्ञेन तरुणी तेन सा तदा ।
रतेनावर्जिता वल्ली रसेन मधुना यथा ॥ २० ॥
ततस्तदनुरक्ता सा पश्यन्ती तन्मयं जगत् ।
न समस्तगुणाकीर्णं भर्तारं बह्वमन्यत ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे वसन्त लता को रस से अपने अधीन करता हे, वैसे ही हार, केयूर आदि से मनोहर उस
विट से, वह तरूणी सुरतोचित क्रीडाओं द्वारा अपने वश में की गई । तदनन्तर इन्द्रनामक
विटपर अनुरक्त हुई सम्पूर्ण जगत् को तन्मय देखती हुई उसे समस्त गुणों से पूर्ण अपना पति
रूचिकर नहीं हुआ