Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 89, Verse 50
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 89, verse 50 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 89 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
एतानि चात्र मनसां न च कारणानि राजञ्शरीरशकलानि वृथोत्थितानि ।
चेतो हि कारणममीषु शरीरकेषु वारीव सर्ववनखण्डलतारसेषु ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई कहे की देह ही मन का कारण है, देह उत्पीडन होने पर मनका उत्पीड़न क्यों
नहीं होता ?
हे राजन्, ये दिखाई दे रहे प्राणियों के शरीररूपी टुकड़े, जो कि वृथा उत्पन्न हुए हैं, मन
के कारण (उत्पादक) नहीं है, किन्तु मन ही इन शरीरों का ऐसा कारण है, जैसे जल सम्पूर्ण
वनों की लताओं के रस का कारण होता है