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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 89, Verses 18–19

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 89, verses 18–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 89 · श्लोक 18,19

संस्कृत श्लोक

बोधयित्वा यथायुक्तं सा तमिन्द्रमथाङ्गना । अहल्यानिकटं रात्र्यामानयामास सत्वरम् ॥ १८ ॥ ततः सा तेन षिङ्गेन सहेन्द्रेण रतिं ययौ । कस्मिंश्चित्सदने गुप्ते बहुमाल्यविलेपना ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

वह सखी इन्द्र को युक्तिपूर्वक समझा-बुझाकर रात्रिमें अहल्याके निकट शीघ्र ले आई। तदनन्तर किसी एक गुप्त घरमें बहुतसी फूलमालाएँ और अंगराग से विभूषित वह अहल्या जैसे गौतमपत्नी अहल्या इन्द्र के साथ रतिको प्राप्त हुई थी वैसे ही उस इन्द्रनामक विट के साथ रति को प्राप्त हुई