Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 89, Verses 28–29
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 89, verses 28–29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 89 · श्लोक 28, 29
संस्कृत श्लोक
अपृच्छत ततो राजा खिन्नौ स्थो न तु दुर्मती ।
तावूचतुर्महीपाल जलाशयसमुद्धृतौ ॥ २८ ॥
संस्मृत्यावामिहान्योन्यमुखकान्तिमनिन्दिताम् ।
आत्मानं न विजानीवो रूढभावं परस्परम् ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
तदनन्तर राजा ने उनसे पूछा : हे
दुर्मतियों, तुम खिन्न हो या नहीं”, जलाशय से निकाले गये उन दोनों ने राजा से कहा : हे
राजन्, परस्पर की अनिन्दित मुखकान्तिका स्मरण करके यहाँ पर हम लोगोंने परस्पर बद्धप्रेम
अपनी आत्मा को नहीं जाना