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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 84

तिरासीवाँ सर्ग समाप्त चौरासीवाँ सर्म राक्षसी के कर्कटी नाम में हेतु, उपदेश से अर्थ की कल्पना ओर दृष्टान्त कथन का उपयोग कथन |

33 verse-groups

  1. Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामजी, मैंने आपसे हिमालय की राक्षसी कर्कटी का यह अनिन्दित…
  2. Verse 2श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, हिमालय पर्वतकी गुफामें वह राक्षसी केसे कर्कटी नाम से उत्…
  3. Verse 3श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, राक्षसो के अनेक वंश हैं, उनमें कोई स्वभावतः सफे…
  4. Verses 4–5कर्कट के (केकड़े के) सदुश होने से एक राक्षस का नाम कर्कट पड़ा | उससे उत्पन्न हुई काली कर्…
  5. Verse 6कही गई आख्यायिका की प्रकृत में योजना करते है । अनुत्पन्न हुआ ही यह जगत्‌ आदिअन्तरहित परमक…
  6. Verse 7जैसे जलराशि में उठ रही (वर्तमान), अतीत ओर अनागत तरंगे भिन्न-अभिन्नरूपसे स्थित हैं, वैसे ह…
  7. Verses 8–10काष्ठ में मिथ्या ही शालभंजिकाबुद्धि उदित होती है, वेसे ही अनागत ही यह सृष्टि आगत-सी प्रती…
  8. Verse 11जैसे बीज में फल आदि (अंकुर आदि) अभिन्न होता हुआ भी भिन्न-सा उदित होता है, वैसे ही चित्‌ म…
  9. Verse 12बीज से लेकर फलपर्यन्त अनुस्यूत एक द्रव्यसत्ता का विच्छेद न होने के कारण फल ओर बीज में कोई…
  10. Verse 13किसी अविचार से उत्पन्न हुआ भेद इन में उपपन्न (प्राप्त) नहीं हो सकता, क्योंकि जिस किसी कार…
  11. Verses 14–16हे रामजी, यह तो भ्रान्ति ही है, यह जैसे किसी कारण के बिना आई वैसे ही जाये । प्रबुद्ध होकर…
  12. Verse 17जगत्‌ की उत्पत्ति आदि के निरूपण का भी प्रयोजन निष्प्रपव वस्तु का ज्ञान ही है, इस आशय से क…
  13. Verse 18श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, यदि भेद असत्‌ ही है, तो ब्रह्म से ही सब कुछ उत्पन्न हुआ,…
  14. Verse 19तात्कालिक भेद की कल्पना करने या व्यावहारिक दृष्टि से सिद्ध भेद आदि के उपादान से शब्दप्रवृ…
  15. Verses 20–21कल्पित पदार्थ से प्रयोजनयुक्त व्यवहार की सिद्धि लोक में भी देखी जाती है । ऐसा कहते हैं ।…
  16. Verses 22–24तुमको उपदेश देने के लिए मेने ही अपने संकल्प से कार्य, कारण आदि भेद की कल्पना कर रक्खी है,…
  17. Verse 25यह व्यवहार उपदेश्य वस्तु का ज्ञान न होने से ही है यानी अज्ञानावस्था में ही है, प्रबोधावस्…
  18. Verse 26हे श्रीरामचन्द्रजी, समय आनेपर बोध को प्राप्त हुए आप परमतत्त्व आदि और अन्त से रहित, विभागश…
  19. Verse 27जिन लोगों को तत्त्व का परिज्ञान नहीं हुआ है, ऐसे अज्ञ पुरुष अपने विकल्पों से उत्पन्न हुए…
  20. Verse 28द्वित भले ही न हो, पर विवाद का असम्भव कैसे हो सकता है, इसपर कहते हैं। द्वैत के बिना वाच्य…
  21. Verses 29–32यदि द्वैत नहीं है, तो “यतो वा“ इत्यादि ब्रह्मलक्षणबोधक श्रुतिवाक्य में पंचमी” आदि विभक्ति…
  22. Verses 33–34मन गन्धर्वनगर की नाई जिसका हम निर्वचन नहीं कर सकते, ऐसे किसी हेतु से यानी अनिवर्चनीय अज्ञ…
  23. Verses 35–36मेरे द्वारा उपदिष्ट अर्थ के अवधान में स्थित आप विवेकरूपी ओषधि- मात्रा से मनोव्याधि की चिक…
  24. Verse 37लौकिक और शास्त्रीय जितने साध्य, पालनीय आदि पदार्थ है, उनके रूप से चित्त ही विकास को प्राप…
  25. Verse 38इन तीनों जगतां की कल्पना का आकाशरूप चित्त सम्पूर्ण दृश्य को अपने अन्दर धारण करता है, तथा…
  26. Verse 39चित्त के दो अंश है-उनमे एक चैतन्य अंश की प्रधानता से दष्टतारूप सर्वकल्पनाओं की बीजभूत अहन…
  27. Verse 40उक्त अर्थ का पूर्वोक्त सृष्टिक्रम के स्मरण द्वारा उपपादन करते हैं । सृष्टि के आरम्भमें यह…
  28. Verse 41ब्रह्मा कैसे देखते है इस पर कहते हैं । (3 साधनों के सिद्ध होने पर भी जो सिद्ध न हुआ हो, व…
  29. Verse 42जैसे सूर्यतेज से सौम्य और निर्मल जल व्याप्त रहता है, वैसे ही सर्वव्यापी आत्मा से अपना चेत…
  30. Verse 43चित्‌ की व्याप्ति से ही चित्त को अविचार से जगत्‌-दर्शन और विचारसे आत्मदर्शन होता है, ऐसा…
  31. Verse 44इस प्रकार शुद्धात्मा ही चित्तभाव द्वारा दृश्यभाव को प्राप्त-सा हुआ है, यह फलित अर्थ निकला…
  32. Verses 45–46ऐन्दवोपाख्यान के दृष्टान्त से जगत में मनोमात्रता का निश्चय कैसे होगा ? इस पर कहते हैं । ऐ…
  33. Verse 47उक्त अर्थ का ही व्यतिरेक से उपपादन करते हैं। जिस वाक्य मेँ दृष्टान्त का उल्लेख नहीं रहता,…