Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 84, Verse 19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 84, verse 19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 84 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
उपदेशाय शास्त्रेषु जातः शब्दोऽथवार्थजः ।
प्रतियोगिव्यवच्छेदसंख्यालक्षणपक्षवान् ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
तात्कालिक भेद की कल्पना करने या व्यावहारिक दृष्टि से सिद्ध भेद आदि के उपादान से
शब्दप्रवृत्ति हो सकती है, अतः बिम्ब-प्रतिबिम्बरूप व्यवहार की नाई उपदेश की उपपत्ति हो
सकती है, इसलिए उक्त दोष नहीं है, इस आशय से श्रीवसिष्ठजी श्रीरामचन्द्रजी की उक्त
शकरा का परिहार करते हैं।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामचन्द्रजी, शास्त्रों में उपदेश के लिए शब्दों की कल्पना की
गई है अथवा लोकसिद्ध अर्थो से उत्पन्न व्यावहारिक भेद का उपजीवी शब्द ही प्रतियोगी,
अभाव, संख्या, लक्षण और पक्षरूप होता हुआ तत्-तत् स्थल में प्रवृत्त होता हे