Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 84, Verses 22–24
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 84, verses 22–24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 84 · श्लोक 22-24
संस्कृत श्लोक
कार्यकारणभावो हि तथा स्वस्वामिलक्षणम् ।
हेतुश्च हेतुमांश्चैवावयवावयविक्रमः ॥ २२ ॥
व्यतिरेकाव्यतिरेकौ परिणामादिविभ्रमः ।
तथा भावविलासादि विद्याविद्ये सुखासुखे ॥ २३ ॥
एवमादिमयी मिथ्यासंकल्पकलना मिता ।
अज्ञानामवबोधार्थं नतु भेदोऽस्ति वस्तुनि ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
तुमको उपदेश देने के लिए मेने ही अपने संकल्प से कार्य, कारण आदि भेद की कल्पना
कर रक्खी है, ऐसा कहते है ।
अज्ञानियों को प्रबुद्ध करने के लिए कार्यकारणभाव, स्वस्वामिभाव, हेतु हेतुमद्भाव,
अवयव-अवयविभाव, भेदाभेद परिणाम आदि का भ्रम, भावों के विविध विलास, विद्या ओर
अविद्या, सुखदुःख इत्यादि रूप मिथ्या संकल्पो की कल्पना की गई है, सत्य वस्तु में वस्तुतः
कोई भेद नहीं हे