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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 84, Verses 45–46

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 84, verses 45–46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 84 · श्लोक 45

संस्कृत श्लोक

यत्कथ्यते हि हृदयंगमयोपमानयुक्त्या गिरा मधुरयुक्तपदार्थया च । श्रोतुस्तदङ्ग हृदयं परितो विसारि व्याप्नोति तैलमिव वारिणि वार्य शङ्काम् ॥ ४५ ॥ त्यक्तोपमानममनोज्ञपदं दुरापं क्षुब्धं धराविधुरितं विनिगीर्णवर्णम् । श्रोतुर्न याति हृदयं प्रविनाशमेति वाक्यं किलाज्यमिव भस्मनि हूयमानम् ॥ ४६ ॥

हिन्दी अर्थ

ऐन्दवोपाख्यान के दृष्टान्त से जगत में मनोमात्रता का निश्चय कैसे होगा ? इस पर कहते हैं । ऐन्दवोपाख्यान के दृष्टान्तों से युक्त, मधुर ओर युक्तियुक्त पदार्थों से पूर्ण वाणी द्वारा जो मैं कहता हूँ, वह शंका को दूरकर श्रोता के हृदयको-जलमें तेल के समान चारों ओर फैलकर-दव्याप्त कर देता है