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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 84, Verse 41

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 84, verse 41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 84 · श्लोक 41

संस्कृत श्लोक

सर्गादिदीर्घसंवित्या शैलादिजडसंविदा । सूक्ष्मं सूक्ष्मविदा चेति देहं शून्यं न वास्तवम् ॥ ४१ ॥

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मा कैसे देखते है इस पर कहते हैं । (3 साधनों के सिद्ध होने पर भी जो सिद्ध न हुआ हो, वह साध्य है। जो पहले से सिद्ध हो, वह पालनीय है । असिद्ध अनेक साधनों के प्राप्त होनेपर प्रयत्न की गुरुता ओर लघुता के विचार से साधनों का सम्पादन कर पीछे सिद्ध होनेवाला जो कार्य है, वह विचार्य है । उसमें भी जो केवल शिष्टों के सम्मत उपायों द्वारा सेव्य होता है, वह आर्यवत्‌ करणीय है । अन्य देश में सिद्ध ही जो अपने घर में लाने योग्य है, वह आहार्य है । अपने घर में स्थित ही जो क्रय-विक्रय आदि के उपयुक्त हो, वह व्यवहार्य है । क्रय- विक्रय के उपयोगी पदार्थों में भी हाथी, घोड़े, रथ आदि संचार्य हैं भूषण आदि धार्य हैँ | पर्वत आदिरूप स्थूल विराट्‌-देह को सृष्टि, स्थिति और प्रलयमें एक-सी साक्षी संवित्‌ से, सृष्टि आदि को जड़ संवित्‌ से यानी जड़ में अहंभावनारूप वैश्वानर संवित्‌ से, सूक्ष्म यानी लिंगसमधष्टिसूत्रात्मक हिरण्यगर्भ-देह को सूक्ष्मसंवित्‌ से (उक्त देहमें अहंभावनासंवित्‌ से) इस प्रकार तीनों देहों को शून्य ही वे देखते हैं, वास्तव में नहीं देखते हैं