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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 84, Verse 43

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 84, verse 43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 84 · श्लोक 43

संस्कृत श्लोक

चित्तबालो जगद्यक्षं मिथ्या पश्यत्यबोधतः । बोधितोऽसौ परं रूपं स्वं पश्यति निरामयम् ॥ ४३ ॥

हिन्दी अर्थ

चित्‌ की व्याप्ति से ही चित्त को अविचार से जगत्‌-दर्शन और विचारसे आत्मदर्शन होता है, ऐसा कहते हैं। चित्तरूपी बालक अज्ञानवश जगद्रूषी मिथ्या वेताल को देखता है, यदि उसमें बोध उत्पन्न किया जाय, तो वह अपने निर्विकार उत्कृष्ट स्वरूप को देखता है