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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 84, Verse 47

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 84, verse 47 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 84 · श्लोक 47

संस्कृत श्लोक

आख्यानकानि भुवि यानि कथाश्च या या यद्यत्प्रमेयमुचितं परिपेलवं वा । दृष्टान्तदृष्टिकथनेन तदेति साधो प्राकाश्यमाशु भुवनं सितरश्मिनेव ॥ ४७ ॥

हिन्दी अर्थ

उक्त अर्थ का ही व्यतिरेक से उपपादन करते हैं। जिस वाक्य मेँ दृष्टान्त का उल्लेख नहीं रहता, मनोहर पद नहीं रहते, जो व्णोके स्फुट न रहने के कारण श्रोत्रेन्द्रिय से गृहीत नहीं हो सकता, क्रोधावेशके कारण क्षुब्ध होकर जिसके वर्ण अपने स्थान से च्युत हुए हों, जिसमें अक्षर पूर्वरूप से न हों (खण्डित हों), ऐसा वाक्य श्रोता के हृदय में असर नहीं करता । वह जैसे भस्म में होमा गया घृत व्यर्थ जाता है, वैसे ही निष्फलता को प्राप्त होता है ॥ ४ ६॥ व्यतिरेक दृष्टान्त से के गये अर्थ का अन्वयद्ष्टान्त से उपपादन करते हुए निगमन करते हैं । जो आख्यान यानी विविध कथाओं से युक्त बड़ी-बड़ी महाभारत आदि कथाएँ हैं, उनसे छोटी जो-जो कथाएँ हैं और अभिज्ञ पुरुषों के अनुरंजन के योग्य जो-जो काव्य, नाटक, अध्यात्मनिबन्ध आदि शब्द से और अर्थ से मधुर हैं, अथवा जो-जो श्रोत्रेन्द्रियका प्रमेय है, वे सब दृष्टान्तों के और लोकप्रसिद्ध प्रमाणदृष्टियों के कथन से ही ऐसे प्रकाशता को प्राप्त होते हैं, जैसे कि चन्द्रमासे लोक प्रकाशता को प्राप्त होता हे