Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 84, Verse 38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 84, verse 38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 84 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
सर्वमभ्यन्तरे चित्तं बिभर्ति त्रिजगन्नभः ।
अहमापूरमिव तद्यथाकालं विजृम्भते ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
इन तीनों जगतां की कल्पना का आकाशरूप
चित्त सम्पूर्ण दृश्य को अपने अन्दर धारण करता है, तथा वही समय पर देह, इन्द्रिय आदि
के तत्-तत् व्यापार करने पर “मैं व्यापार करता हू, इस प्रकार अहन्ता के प्रवाह की नाई
बढ़ता हे