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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 84, Verses 33–34

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 84, verses 33–34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 84 · श्लोक 33

संस्कृत श्लोक

मनोमनननिर्माणमात्रमेव जगत्त्रयम् । सर्वमुत्सृज्य शान्तात्मा स्वात्मन्येव निवत्स्यसि ॥ ३३ ॥ मद्वाक्यार्थावधानस्थो मनोव्याधिचिकित्सने । विवेकौषधलेशेन प्रयत्नं च करिष्यसि ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

मन गन्धर्वनगर की नाई जिसका हम निर्वचन नहीं कर सकते, ऐसे किसी हेतु से यानी अनिवर्चनीय अज्ञान से उत्पन्न हुए इस जगत्‌ नामक अपने विजृम्भण (विकास) का, विस्तार करता है जो केवल श्रांतिमात्र है ॥ ३ ०॥ उक्त अर्थ में आगे कही जानेवाली आख्यायिका का दुष्टान्त के रूप से अवतरण करते हैं । हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे चित्त इस जगन्मायाको फैलाता है, वैसा यह (आगेका) दृष्टान्त, जिस पर केवल दृष्टि देने से ही दार्ष्टान्तिक का परिज्ञान हो जाता हे, मैं आपसे कहता हूँ, सुनिये ॥ ३ १॥ हे श्रीरामचन्द्रजी, जिस दृष्टान्त को सुनकर यह सम्पूर्ण दृश्य भ्रान्तिमात्र ही है, ऐसा स्वयं निश्चय करके आप वासनाओं का परित्याग कर देंगे ॥ ३ २॥ केवल मनकी कल्पना द्वारा बने हुए इन सम्पूर्ण तीनों लोकों का परित्याग कर शान्तस्वरूप होकर आप स्वात्मामें ही स्थित होंगे