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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 53

24 verse-groups

  1. Verses 1–3पतिमिलन की सम्भावना से प्रबल कामवेदनावाली तथा छोटे से आकारवाली वह आनन्दपूर्वक आकाश में चि…
  2. Verse 4कुमारी ने कहा : हे सरस्वती देवी की सखी, मैं तुम्हारी कन्या हूँ, हे सुन्दरी, आपका स्वागत ह…
  3. Verse 5लीला ने कहा : हे देवता के शरीर को प्राप्त हुई वत्से, हे कमललोचने, मुझे मेरे पति के समीप म…
  4. Verse 6श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामचन्द्रजी, “देवी ! आइए, वहींपर हम दोनों जाते हैं, यह कहकर वह…
  5. Verses 7–9उस कुमारी के पीछे-पीछे चलती हुई लीला, जैसे होनेवाले शुभ और अशुभ को सूचित करनेवाली ब्रह्मा…
  6. Verse 10जैसे घड़े के भीतर रक्खे हुए हिमजल की शीतलता घड़े के फूटे बिना भी बाहर निकल आती है, वैसे ह…
  7. Verse 11लीला का यह गमन केवल उसकी मन की कल्पना ही थी, इसका स्मरण कराते हैं। संकल्पमात्रदेहवाली लील…
  8. Verses 12–14ब्रह्मा आदि के लोकों को लाँघकर ब्रह्माण्ड के कपाल में पहुँचकर तदुपरान्त ब्रह्माण्ड के पार…
  9. Verses 15–16उनमें से एक में, जो किं उसके सामने था और विस्तृत आवरण से युक्त था, जैसे छोटा कीड़ा बेर को…
  10. Verse 17भूमण्डल में राजा पद्म के राज्य में और उसके नगर में पहुँचकर तत्पश्चात उस मण्डप में प्रविष्…
  11. Verse 18इतने में ही सुन्दरी लीला ने कुमारी को नहीं देखा, जैसे ज्ञान होने पर माया कहीं चली जाती है…
  12. Verses 19–20शवरूपी अपने पति का मुख देखकर लीला ने अपने तर्क से उसे सत्य समझा । संग्राम में सिन्धु के ह…
  13. Verses 21–22मैं श्रीदेवीजी के वरदानरूप प्रसाद से सदेह ही (अपने प्राक्तन स्थूल देह से युक्त ही) इस प्र…
  14. Verse 23प्रबुद्ध लीला ने कहा : हे देवि, वे नौकर-चाकर, वे दासियाँ और वह राजा उसे कैसे जान पाये ? व…
  15. Verses 24–27यदि सभी को ऐसी प्रतीति हो कि यह कोई नई आई है तभी उक्त दोष आ सकता है । सत्यसंकल्पवाले हमार…
  16. Verse 28प्रबुद्ध लीला ने कहा : हे देवी, यह मधुरभाषिणी लीला, जिसे आप पति के पास पहुँच गई कहती है,…
  17. Verses 29–30श्रीदेवीजी ने कहा : भद्रे जैसे छाया धूप को नहीं पा सकती, वैसे ही अज्ञानी (आत्मा के ज्ञान…
  18. Verse 31यदि लीला यह पूछे कि इसे आपके वरदान के बल से अस्थूल आत्मा का ज्ञान क्यों नहीं हुआ ? इस पर…
  19. Verses 32–33जव तक आत्मा में अज्ञानरूपी ज्वर की गर्मी रहती है, तब तक विवेकरूपी चन्द्रमा की शीतलता पूर्…
  20. Verse 34मेरा शरीर पृथिवी आदि से निर्मित है, मेरी आकाश में उत्तम गति नहीं हो सकती, जिसके अन्तःकरण…
  21. Verse 35आतिवाहिक देह के मिलने पर स्थूल में अहंभाव की निवृत्ति कैसे होती है ? इस शंका पर देवीजी कह…
  22. Verses 36–38वर और शाप भी पूर्वजन्म की वासना ओर कर्म के अनुसार ही कर्म ओर वासना के उद्बोधकरूप से प्राण…
  23. Verse 39यदि कोई शंका करे कि अर्थकरियाकारी स्थूल देह का तत्त्वज्ञान से कैसे बाध होता है ? इस पर तत…
  24. Verse 40यदि किसी को यह शंका हो कि संसार यदि आन्तर वासनामय है, तो वह बाह्य कैसे प्रतीत होता है, तो…