Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 53, Verses 32–33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 53, verses 32–33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
अविवेकज्वरोष्णत्वं विद्यते यावदात्मनि ।
तावद्विवेकशीतांशुशैत्यं कुत उदेत्यलम् ॥ ३२ ॥
अहं पृथ्व्यादिदेहः खे गतिर्नास्ति ममोत्तमा ।
इतिनिश्चयवान्योऽन्तः कथं स्यात्सोऽन्यनिश्चयः ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
जव तक आत्मा में अज्ञानरूपी ज्वर की गर्मी रहती
है, तब तक विवेकरूपी चन्द्रमा की शीतलता पूर्वरूप से कैसे उदित हो सकती है ?