Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 53, Verse 35
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 53, verse 35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
शुष्कपर्णं किलाङ्गारे एतदेवाशु दह्यते ।
अयं देहमहंदेहः प्राप्त एव विशीर्यते ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
आतिवाहिक देह के मिलने पर स्थूल में अहंभाव की निवृत्ति कैसे होती है ? इस शंका पर
देवीजी कहती है ।
जैसे सूखा हुआ पत्ता जल रही अग्नि में गिरते गिरते तुरन्त ही जल जाता हे, वैसे ही यह
स्थूल देह अहंकार-वासनामय आतिवाहिक देह को प्राप्त होते ही नष्ट हो जाता हे