Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 53, Verses 1–3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 53, verses 1–3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 1-3
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अथ लब्धवरा देहेनानेनैव महीपतिम् ।
पतिमाप्तुं प्रयात्येषा नभोमार्गेण विष्टपम् ॥ १ ॥
इति संचिन्त्य सानन्दमुद्दाममकरध्वजा ।
पुप्लुवे पेलवाकारा पक्षिणीव नभस्तले ॥ २ ॥
कुमारीं तत्र सा प्राप ज्ञप्त्यैव प्रहितां हिताम् ।
स्वसंकल्पमहादर्शात्पुरतो निर्गतामिव ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
पतिमिलन की सम्भावना से प्रबल कामवेदनावाली तथा छोटे से आकारवाली वह आनन्दपूर्वक
आकाश में चिड़िया की नाई उड़ी | वहाँ पर उसको सरस्वती देवी के द्वारा भेजी गई उसकी
कन्या ऐसे मिली, मानों वह उसके संकल्परूपी महान दर्पण से उसके सामने निकल आई
हो