Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 53, Verse 39
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 53, verse 39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
स्वानुभूते जगज्जाले सुगमा संस्मृतिभ्रमाः ।
नान्यसंकल्पितो नाम सर्गाद्यभ्यास ईदृशः ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे कि अर्थकरियाकारी स्थूल देह का तत्त्वज्ञान से कैसे बाध होता है ? इस
पर तत्त्वद्ृष्टि से स्थूलदेह में अर्थक्रिया का ही अभाव है, ऐसा श्रीदेवीजी कहती है ।
रस्सी में जो सर्प की भ्रमात्मक प्रतीति होती है, वह सर्प का कार्य कैसे कर सकती है ? जो
पदार्थ स्वस्वरूप से हे ही नहीं, उसकी कार्यकारिता कैसे हो सकती है २।३७॥
यदि स्थूल देह है ही नहीं, तो यह देह मर गई, ऐसा सबको क्यो अनुभव होता है ?
इस पर कहती हैं।
“यह मर गया' इत्याकारक मिथ्या पदार्थ का जो सबको अनुभव होता है वह अनुभव खूब
बढ़े हुए पूर्व जन्म के अभ्यास के संस्कार से होता है ॥ ३ ८॥ जब यह जगत्-जाल खूब अनुभूत
हो जाता है, तब भ्रमात्मक स्मरण बराबर अभ्याससे सुगम हो जाते हैं । इस प्रकार का यह
सृष्टि का अभ्यास वर या शाप देनेवाले हिरण्यगर्भ या ईश्वर द्वारा हमारे वासना, कर्म आदि से
निरपेक्ष होकर नहीं बनाया गया है अर्थात् हमारी वासना और कर्म से सापेक्ष होकर ही बनाया
गया है