Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 53, Verse 34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 53, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
अतो ज्ञानविवेकेन पुण्येनाथ वरेण च ।
पुण्यदेहेन गच्छन्ति परं लोकमनेन तु ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
मेरा शरीर पृथिवी आदि से निर्मित है, मेरी आकाश में उत्तम गति नहीं हो सकती, जिसके
अन्तःकरण में ऐसे निश्चय की जड़ जमी हुई है, उसमें अन्य प्रकार का (उक्त निश्चय से
विपरीत) निश्चय केसे हो सकता है २।३३॥ अतएव लोग विवेकज्ञान से, प्रचुर पुण्य से ओर
वरदान से इस (तुम्हारे सदृश) पुण्य शरीर से परलोक मेँ जाते हैं