Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 53, Verses 7–9
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 53, verses 7–9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 7-9
संस्कृत श्लोक
ततस्तदनुयाता सा प्राप कोटरमम्बरम् ।
निर्मलं करमालाग्रं यथा लक्षणलेखिका ॥ ७ ॥
मेघमार्गमथोल्लङ्घ्य वातस्कन्धान्तरे गता ।
सूर्यमार्गादभिगता तारामार्गमतीत्य च ॥ ८ ॥
वाय्विन्द्रसुरसिद्धानां लोकानुल्लङ्घ्य लाघवात् ।
ब्रह्मविष्णुमहेशानां प्राप ब्रह्माण्डखर्परम् ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
उस
कुमारी के पीछे-पीछे चलती हुई लीला, जैसे होनेवाले शुभ और अशुभ को सूचित करनेवाली
ब्रह्माकी रची हुई हस्तरेखा प्राणियों के हाथ के तलवे को प्राप्त होती है, वैसे ही ब्रह्माण्ड के
छिद्ररूप निर्मल आशा को प्राप्त हुई । तदनन्तर लीला पहले मेघमार्ग को लाँघकर प्रवह, आवर
आदि वायुसमूह के मार्ग में पहुँची, तदुपरान्त सूर्यमार्ग से निकलकर, नक्षत्र मार्ग को लाँधकर
ओर शीघ्रता से वायु, इन्द्रदेव और सिद्धो के लोकों का तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिवजी के
लोकों का भी अतिक्रमण कर वह ब्रह्माण्डकपाल में पहुँची