Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 53, Verses 24–27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 53, verses 24–27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 24-27
संस्कृत श्लोक
श्रीदेव्युवाच ।
स राजा सा च ते भृत्याः सर्व एव परस्परम् ।
चिदाकाशैकतावेशादावयोश्च प्रभावतः ॥ २४ ॥
महाचित्प्रतिभासत्वान्महानियतिनिश्चयात् ।
अन्योन्यमेवपश्यन्ति मिथः संप्रतिबिम्बितात् ॥ २५ ॥
इयं मे सहजा भार्या ममेयं सहजा सखी ।
ममेयं सहजा राज्ञी भृत्योऽयं सहजो मम ॥ २६ ॥
केवलं त्वमहं सा च यथावृत्तमखण्डितम् ।
ज्ञास्याम इदमाश्चर्यं नतु कश्चिदपीतरः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि सभी को ऐसी प्रतीति हो कि यह कोई नई आई है तभी उक्त दोष आ सकता है ।
सत्यसंकल्पवाले हमारे प्रभावसे वैसी प्रतीति ही नहीं होगी, इस प्रकार देवी पूर्वोक्त शका का
समाधान करती है ।
वह राजा, वासनामयी लीला ओर उनके नौकर-चाकर सभी आपस में एक दूसरे को
एकमत से ही देखते हैं यानी जैसे राजा की रानी के प्रति “यह मेरी पत्नी है", यह बुद्धि है, वैसे
ही रानी की राजा के प्रति “यह मेरा स्वामी हे", यह मति है और जैसे नौकरो के प्रति उनकी ये
हमारे नौकर हैं, एसी मति हे वैसे ही नौकरों की भी ये हमारे मालिक हैं, ऐसी मति है, क्योकि
उनकी एसी प्रतीति होने में चार हेतु हैं - पहला हेतु है - सत्यसंकल्पवाले हम दोनों का प्रभाव,
दूसरा हेतु है-साक्षीरूप चिदाकाश का ऐसा स्फूरण जिससे कि सबकी एकमति हो ओर जो
प्रत्येक की बुद्धि के, जल में सूर्य के प्रतिबिम्ब के समान, भीतर पैठा है, तीसरा हेतु है -
ब्रह्मचैतन्य का भोक्ता के अदृष्ट के अनुसार तत् तत् रूप में विवर्तं होना और चौथा हेतु
"उनका महानियति के (इसे ऐसा ही होना चाहिए, इस प्रकार के ईश्वर के संकल्प के) अधीन
में रहना, यानी सत्य संकल्पवाले इन लोगों के प्रभाव से सबकी बुद्धि में प्रतिविम्ब की नाई
स्थित चिदाकाश के एेकमत्यानुकूल स्फुरण से, भोक्ता के अदृष्टानुसार ब्रह्मरूप महाचेतन्य
का तादश विवर्त होने से ओर "इसको ऐसा ही होना चाहिए इस प्रकार के भगवान् के संकल्प
के अधीन होने से उनकी परस्पर एक मति थी । यह मेरी सहज (साथ उत्पन्न हुई) पत्नी है,
यह मेरी सहज रानी है, यह मेरा सहज नौकर है । इस आश्चर्यमय वृत्तान्त को आदिसे लेकर
अन्त तक पूरे-का-पूरा तुम्हारे, मेरे ओर इसके (विदूरथ की पत्नी लीला के) सिवा दूसरा
कोई भी नहीं जान पायेगा