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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 53, Verses 36–38

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 53, verses 36–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 36

संस्कृत श्लोक

एतावदेव भवति वरशापविजृम्भितैः । यथा संचिन्त्य एवाहं तथा स्मृत इति स्मृतिः ॥ ३६ ॥ यः सर्पप्रत्ययो रज्ज्वां स कथं सर्पकार्यकृत् । आत्मन्येव हि यो नास्ति तस्य का कार्यकारिता ॥ ३७ ॥ यस्त्वेतन्मृत इत्येव मिथ्या समनुभूयते । प्रागभ्यासस्य पुष्टस्य नामैतत्प्रविजृम्भते ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

वर और शाप भी पूर्वजन्म की वासना ओर कर्म के अनुसार ही कर्म ओर वासना के उद्बोधकरूप से प्राणियों को मिलते हैं, यह बात स्मृति के दृष्टान्त से श्रीदेवीजी कहती हैँ । जैसे पहले से खूब अभ्यस्त होने पर भी तुरन्त संस्कार का उद्बोध न होने से चिरकाल तक जिसमें चिन्तन करने की आवश्यकता होती है, ऐसे अनुवाद आदि को जब कोई आदमी प्रतीक के कथन द्वारा स्मरण कराता है, तब जिसे स्मरण होता है वह पुरुष कहता है-जैसा आपने स्मरण कराया वैसा ही मैंने उसका स्मरण किया, यों जैसे स्मरण होता हे वैसे ही वर ओर शाप के अभ्युदय से वासना ओर कर्म की स्मृति होती है