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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 53, Verses 29–30

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 53, verses 29–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 29,30

संस्कृत श्लोक

श्रीदेव्युवाच । अप्रबुद्धधियः सिद्धलोकान्पुण्यवशोदितान् । न समर्थाः स्वदेहेन प्राप्तुं छाया इवातपान् ॥ २९ ॥ आदिसर्गे च नियतिः स्थापितेति प्रबोधिभिः । यथा सत्यमलीकेन न मिलत्येव किंचन ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीदेवीजी ने कहा : भद्रे जैसे छाया धूप को नहीं पा सकती, वैसे ही अज्ञानी (आत्मा के ज्ञान से शून्य) लोग पुण्यो के प्रभाव से प्राप्त हुए शुभ लोकों को नहीं पा सकते । प्रथम सृष्टि में सत्यसंकल्पवाले ईश्वर, हिरण्यगर्भ आदि ने ऐसी मर्यादा कर छोडी है, जैसे कि सत्य वस्तु मिथ्या वस्तु से तनिक भी नहीं मिलती है, जैसे कि भाष्य है-जहाँ (सत्य पदार्थ में) जिसका (मिथ्या पदार्थ का) अध्यास है, वह (सत्य) अध्यस्त (मिथ्या पदार्थ) के गुण और दोषों से अणुमात्र भी लिप्त नहीं होता