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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 53, Verses 15–16

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 53, verses 15–16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 15,16

संस्कृत श्लोक

तत्रैकस्मिन्पुरःसंस्थे विततावरणान्विते । वेधयित्वा विवेशान्तर्बदरं कृमिको यथा ॥ १५ ॥ पुनर्ब्रह्मेन्द्रविष्ण्वादिलोकानुल्लङ्घ्य भास्वरान् । तन्महीमण्डलं श्रीमत्प्राप तारापथादधः ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

उनमें से एक में, जो किं उसके सामने था और विस्तृत आवरण से युक्त था, जैसे छोटा कीड़ा बेर को छेदकर भीतर घुसता है, वैसे ही उसे छेदकर वह उसमें प्रविष्ट हुई । फिर ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु आदि के देदीप्यमान लोकों को ्लोघकर आकाश के नीचे राजा पद्म के समृद्ध भूमण्डल में पहुँची