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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 53, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 53, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

लीलोवाच । देवि भर्तुः समीपं मां नय नीरजलोचने । महतां दर्शनं यस्मान्न कदाचन निष्फलम् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

लीला ने कहा : हे देवता के शरीर को प्राप्त हुई वत्से, हे कमललोचने, मुझे मेरे पति के समीप में ले जाओ । यदि कुमारी कहे कि तुम्हें पति की चाह है, तो तुम भले ही मेरे पिताजी के पास जाओ मैं वहाँ क्यो जाऊ ? इस पर लीला कहती है। महान्‌ लोगों का दर्शन कभी भी निष्फल नहीं जाता, मेरी भलाई के लिए मैंने जो कहा उसे करो, यह तात्पर्य है