Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker) · Sarga 18
सत्रहवाँ सर्ग समाप्त अठारहवाँ सर्ग मुख्य, अमुल्य ओर आनुषंगिक फलों के साथ इस ग्रन्थ के गुणों का निरूपण |
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- Verse 1इस प्रकार विषय और प्रयोजन से प्रकरणभेद का वर्णन कर सम्पूर्ण ग्रन्थ के गुणों का वर्णन कर र…
- Verses 2–3अनेक शाखाओं के भेद से विभिन्न अनेक श्रुतियों के विद्यमान रहते उन्हें छोड़कर पुरुषबुद्धि स…
- Verse 4यदि कोड कहे कि पुरुषबुद्धि से विरचित शास्त्र ही ग्राह्य है, तो हमारे पूर्वजों के बनाये हु…
- Verse 5अन्य की अपेक्षा इसमें अतिशय दिखलाते है । जैसे प्रातःकाल होने पर अवश्य ही प्रकाश होता हे,…
- Verses 6–7गुडजिहिकान्याय से आनुषंगिक फलो को दशनि की इच्छा से श्रीवसिष्ठजी पहले शब्दव्युत्यत्तिरूप प…
- Verses 8–18अर्थव्युत्पत्तिरूपी चतुरता भी इसका दूसरा फल है, ऐसा कहते हैँ । महत्त्वरूपी गुण से शोभित ह…
- Verses 19–42इस प्रकार आनुषंगिक (गौण) फलों को दर्शा कर मुख्य फल दशति है । भूमिका के क्रम से सम्पूर्ण व…
- Verses 43–47यह प्रपंच अति विस्तीर्ण है, इसका करोड़ों कृदालियो से भी छेदन नर्ही हो सकता यह अनायास कैसे…
- Verses 48–51हे श्रीरामचन्द्रजी, मुझसे कहे जा रहे इस शास्त्र को आप सुनिए, यह शास्त्र जिनकी बुद्धि अत्य…
- Verse 52दृष्टान्तों में विलक्षित सादृश्य के विवेक के लिए त्याज्य अंश को दिखलाते हैं । हे काकुत्स्…
- Verse 53परब्रह्म के दृष्टान्तों में ही यह नियम है, अन्य दृष्टान्तो में यह नियम लागू नहीं है । - ऐ…
- Verse 54जो पूर्व श्लोक में परम ब्रह्म को छोड़ कर” कहा है, उसे विशेषरूप से स्पष्ट करते हैं । मैं य…
- Verse 55दृष्टान्त का एक देश में ही ग्रहण क्यो होता है ? ऐसी कोड शंका न कर बैठे, इसलिए सवशि में सा…
- Verse 56ऐसा होने पर निराकार ब्रह्म में साकार दृष्टान्त कैसे ? ब्रह्म सद्वितीय है या अद्वितीय ? यद…
- Verse 57इससे दृृष्टान्त के अनुमान द्वारा बोधक होनेसे द्ष्टान्त, हेतु, व्याप्ति आदि के मिथ्या होने…
- Verse 58हेतु आदि भूत जगत् की स्वप्नोपमता का साधर्म्यप्रदर्शन द्वारा उपपादन करते हैं। उत्पत्ति के…
- Verses 59–60यदि शंका हो कि प्रतिभासिक सत्तावाले स्वप्न से व्यावहारिक सत्तावाले की तुलना कैसे हो सकती…
- Verses 61–63को कहे कि यदि ऐसा है, तो इस ग्रन्थ के श्रोता, जगत् की जो स्वप्न तुल्यता कही गई है, उसे स…
- Verse 64यदि जगत् में स्वप्नादि दष्टान्त देने पर सवशि मे साधर्म्य विवक्षित हो, तो ब्रह्म में भी क…
- Verse 65लोक में भी मणि दीपक के सद्वश दिखाई देती है“ इत्यादि स्थल में अविवक्षित अंश का सादृश्यज्ञा…
- Verses 66–67इस शास्त्र के सम्पूर्ण दृष्टान्तो का उपयोग कहते हैं । दृष्टान्त के अंशमात्र से बोध्य का (…
- Verse 68का असंभव है, वह प्रकार आगे कहा जायेगा
- Verse 69सभी लोग प्रतिबन्धशून्य स्वेच्छाविहारजनित सुख के प्रार्थी है, अतः दयालु परमहितैषी चार्वाक…
- Verse 70यदि ऐसी बात है, तो कपिल, कणाद, जैमिनि आदिने वेदार्थ के ज्ञाता होने पर भी, पुरुषार्थ ओर उस…