Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 18, Verses 48–51
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 18, verses 48–51 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 48-51
संस्कृत श्लोक
श्रृणु तावदिदानीं त्वं कथ्यमानमिदं मया ।
राघव ज्ञानविस्तारं बुद्धिसारतरान्तरम् ॥ ४८ ॥
यथेदं श्रूयते चास्त्रं तामापातनिकां श्रृणु ।
विचार्यते यथार्थोऽयं यथा च परिभाषया ॥ ४९ ॥
येनेहाननुभूतेऽर्थे दृष्टेनार्थेन बोधनम् ।
बोधोपकारफलदं तं दृष्टान्तं विदुर्बुधाः ॥ ५० ॥
दृष्टान्तेन विना राम नापूर्वार्थोऽवबुध्यते ।
यथा दीपं विना रात्रौ भाण्डोपस्करणं गृहे ॥ ५१ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी,
मुझसे कहे जा रहे इस शास्त्र को आप सुनिए, यह शास्त्र जिनकी बुद्धि अत्यन्त परिशुद्ध है,
उनका हृदयभूत है या विवेकबुद्धि से गृहीत होनेवाले सारतर पदार्थो की चरमसीमारूप है या
इस शास्त्र का विषय बुद्धि से भी बढ़कर सारतर प्रत्यगत्भूत आत्मतत्त्व हे ओर यह ज्ञान का
विस्तार करनेवाला हे । जिस दृष्टान्त से यह शास्त्र सुना जाता है और जिस संकेत से इस ग्रन्थ
का यथार्थरूप से विचार किया जाता है, उस अवतरणिका को आप सुनिए । जिस अर्थ का
अनुभव नहीं हे, वह अननुभूत अर्थ हे, इस शास्त्र में अननुभूत अर्थ में जिस दृष्ट अर्थ से
सादृश्य से बोध किया जाता हे, बोधोपकाररूप फलको देनेवाला उसको विद्वान् लोग दृष्टान्त
कहते हें । (दृष्टान्त ~ दृष्टः अन्तः सादृश्य बलेन प्रकृतार्थनिर्णयो येन सः। जिससे सादृश्य के
बल से प्रस्तुत अर्थ का निश्चय होता है, वह दृष्टान्त हे ।) हे श्रीरामचन्द्रजी जैसे रात्रि में दीपक
के बिना घर में स्थित घट, पट आदि पदार्थो का परिज्ञान नहीं होता वैसे ही दृष्टान्त के बिना
अपूर्व (अननुभूत) अर्थ का परिज्ञान नहीं होता