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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 18, Verses 2–3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 18, verses 2–3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 2,3

संस्कृत श्लोक

अपि पौरुषमादेयं शास्त्रं चेद्युक्तिबोधकम् । अन्यत्त्वार्षमपि त्याज्यं भाव्यं न्याय्यैकसेविना ॥ २ ॥ युक्तियुक्तमुपादेयं वचनं बालकादपि । अन्यत्तृणमिव त्याज्यमप्युक्तं पद्मजन्मना ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

अनेक शाखाओं के भेद से विभिन्न अनेक श्रुतियों के विद्यमान रहते उन्हें छोड़कर पुरुषबुद्धि से विरचित इसी को आप परम उपादेय क्यो कहते हैं ? ऐसी शंका होने पर कहते हैं। यदि पुरुषबुद्धि से विरचित शास्त्र युक्तियों द्वारा तत्त्व का निर्णायक हो, तो उसका भी ग्रहण करना चाहिए । युकितियों द्वारा तत्त्व का निर्णय न करनेवाले आर्ष ग्रन्थ का (वेदका) भी त्याग करना चाहिए । पुरूष को सदा न्याय से युक्त (युक्ति-युक्त) का ही अनुसरण करना चाहिए। भाव यह कि यद्यपि श्रुतियाँ पुरुषबुद्धिविरचित शास्त्र की अपेक्षा अत्यन्त पूज्यतम हैं तथापि उनका अभिप्राय नितान्त गुढ़ है, अत: उनसे सहसा ज्ञान नहीं होता; इसलिए साधारण अधिकारियों को उनका ग्रहण नहीं करना चाहिए, सार के ज्ञाता सत्पुरुषों के अनुभवमूलक युक्तियों से पूर्ण इस शास्त्र का अभिप्राय अत्यन्त साफ है, अतः इससे शीघ्र ज्ञान होता है, इसका अवश्य सादर सेवन करना चाहिए । युक्तियों से पूर्ण वचन बालक का भी हो, तो उसको ले लेना चाहिए और युक्तियों से शून्य वचन ब्रह्माजी का ही क्यो न हो पर उसका तृण के समान त्याग कर देना चाहिए