Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 18, Verse 57
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 18, verse 57 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 57
संस्कृत श्लोक
अन्यासिद्धविरुद्धादिदृग्दृष्टान्तप्रदूषणैः ।
स्वप्नोपमत्वाज्जगतः समुदेति न किंचन ॥ ५७ ॥
हिन्दी अर्थ
इससे दृृष्टान्त के अनुमान द्वारा बोधक होनेसे द्ष्टान्त, हेतु, व्याप्ति आदि के मिथ्या होने
पर व्याप्यत्वासिद्धि, स्वरूपासिद्ध इत्यादि और प्रपंच से सम्बन्ध रखनेवाले हेतुओं से सत्यत्व
आदि के साधने विरूद्धत्व आदि हेत्वाभासता के प्रयोजक दोष होगे, यो ताकिको को विवाद
के लिए अवसर भी नही दिया गया, ऐसा कहते है ।
असिद्ध, विरुद्ध आदि दूषण देने में दक्ष तार्किकों के दृष्टान्त- दोषों से, दूषणीय जगत् के
स्वप्नतुल्य होने के कारण, वस्तु में कुछ भी दोष नहीं होता । साध्य की सिद्धि होने तक हेतु
आदि जगत् के पदार्थो मे जो बोध्यबोधक-व्यवहार होता है, वह व्यावहारिक सत्यतामात्र से
भी उत्पन्न हो जाता है, यह भाव हे