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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 18, Verse 56

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 18, verse 56 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 56

संस्कृत श्लोक

एवं सति निराकारे ब्रह्मण्याकारवान्कथम् । दृष्टान्त इति नोद्यन्ति मूर्खवैकल्पिकोक्तयः ॥ ५६ ॥

हिन्दी अर्थ

ऐसा होने पर निराकार ब्रह्म में साकार दृष्टान्त कैसे ? ब्रह्म सद्वितीय है या अद्वितीय ? यदि सद्वितीय है, तो सिद्धान्त की हानि होगी । यदि अद्वितीय है, तो गुरु, शास्त्र आदि के अभाव से ज्ञान की उत्पत्ति नहीं होगी, इस प्रकार के विकल्पों से उत्पन्न मूर्खजनों की उक्तियों को अवसर नहीं मिलता