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Yoga Vasistha — Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 18, Verse 65

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Mumukshu Vyavahara Prakarana (Conduct of the Seeker), Sarga 18, verse 65 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 65

संस्कृत श्लोक

अर्थावलोकने दीपादाभामात्रादृते किल । न स्थानतैलवर्त्यादि किंचिदव्युपयुज्यते ॥ ६५ ॥

हिन्दी अर्थ

लोक में भी मणि दीपक के सद्वश दिखाई देती है“ इत्यादि स्थल में अविवक्षित अंश का सादृश्यज्ञान नहीं देखा जाता, ऐसा कहते हैं। पदार्थो के प्रदर्शन में प्रकाशमात्ररूप दीपक के सिवा स्थान (दिया), तेल, बत्ती आदि किसीका उपयोग नहीं होता । एकदेश में सादृश्य होने से उपमान उपमेय का ज्ञान कराता है; जैसे 'मणिर्दीप इव” (मणि दीपक के समान है) इस दृष्टान्त से उपमान दीप केवल प्रभा से (प्रकाश से) उपमेय मणि का बोध करा देता है